Friday, May 3, 2019

साध्वी प्रज्ञा: प्रतिबंध से पहले चुनाव प्रचार का एक दिन

'बुर्क़ा बैन' की मांग से वो सहमत हैं लेकिन कहती हैं कि 'ये फ़ैसला उस पंत के लोगों को स्वंय लेना चाहिए', राहुल गांधी की नागरिकता विवाद को वो 'हमेशा झूठ बोलने वाली कांग्रेस के जवाब देने' की घड़ी बताती हैं और आरएसएस-वीएचपी की संगत में प्रज्ञा ठाकुर के बिगड़ जाने के कांग्रेस नेता के बयान पर कहती हैं कि 'वो मर्यादा का पालन करें.'

प्रज्ञा ठाकुर का लहजा इन दिनों काफ़ी संयमित सा है.

लेकिन भटकाव पूरी तरह थमा नहीं - बुधवार दोपहर एक नुक्कड़ सभा में गिरफ्तारी के दौरान अपने अपमान और पीड़ा की बात कहते और वोट मांगते हुए वो कह गईं, हमारा 'स्वर भी ऊंचा हो, और हाथ भी ऊंचा हो और अगर आवश्यकता पड़े तो लात भी ऊंचा हो.'

स्वर और आवाज़ ऊंचा रखनेवाला कुछ इसी तरह का गर्म माहौल भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर के पॉश रिवयरा टाऊन बंगले और उसके आसपास के मकानों में भी नज़र आता है जहां उनके समर्थक ठहरे हुए हैं.

हालांकि सुबह तक़रीबन सात-सवा सात बजे जब हम रिवयरा टाउन बंगला नंबर 128 पहुंचे तो वहां बिल्कुल सन्नाटा पसरा था, न उम्मीदवार, न समर्थक, न सेवक-कारिंदे, सिवाए बंगले के बाहर खड़ी काली एसयूवी और टेंट के सामने बंदूक़ लिए बैठे कांस्टेबल ब्रजेश शर्मा के जिन्होंने बताया कि शायद अभी कोई जगा नहीं.

बंगले में लगे उड़हल के पेड़ और गेट के बीच बने खंभे पर लगे पोस्टर हमारी तरफ़ ज़रूर देख अपनी बात कह रहे थे-

(दिग्वजिय शासनकाल में सड़क, बिजली की बूरी हालत को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने बंटाधार शब्द को ख़ूब प्रचिलित किया था)

दूसरों के दुखों का अंत करने का दावा करने वाली साध्वी प्रज्ञा चुनाव प्रचार के दौरान महाराष्ट्र पुलिस के विशेष दल द्वारा गिरफ़्तारी और टार्चर किए जाने की बात को बार-बार दुहराती हैं.

बीबीसी को दिए गए विशेष साक्षात्कार में भी उन्होंने कहा कि उन्हें तो जेल में ही मारने की साज़िश चल रही थी और उन्हें कैंसर हो जाने के बाद भी लंबे वक़्त तक ज़मानत नहीं दी गई.

ऐसा उन्होंने उस सवाल के जवाब में कहा था कि वो उस मांग पर क्या कहेंगी कि जब वो चुनाव प्रचार के लिए सक्षम हैं तो स्वास्थ्य के आधार पर दी गई उनकी ज़मानत रद्द की जानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि उन्हें तो पता ही नहीं है कि मुझे ज़मानत सिर्फ़ स्वास्थ्य के आधार पर नहीं मिली है.

साल 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम ब्लास्ट मामले में गिरफ़्तार होने के बाद साध्वी प्रज्ञा ने लगभग नौ साल जेल में गुज़ारे और फिलहाल उनपर अदालत में मुक़दमा जारी है.

उनपर मध्य प्रदेश के देवास में आरएसएस कार्यकर्ता और अपने पूर्व सहयोगी सुनील जोशी की हत्या की साज़िश रचने का भी केस चला.

समर्थकों के ज़रिये प्रचार में बांटे जा रहे पर्चे में भी कहा गया है कि उन्हें इतनी यातनाएं दी गईं कि अब वो स्वंय अकेले चल भी नहीं सकतीं.

पर्चे में कहा गया है कि शायद इस लाचारी की वजह कर वो सबतक नहीं पहुंच सकें लेकिन अपील है कि वो कमल को वोट दें और मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाकर राष्ट्र को सुरक्षित करें.

भरत नगर में वोटरों से बात करते हुए वो द्रौपदी के चीरहरण और सीता के अपहरण की बात करती हैं और कहती हैं कि दोनों सच हैं और लोग इसे अपने-अपने नज़रिये से देखते हैं लेकिन कांग्रेस ने उन्हें फंसा कर संतों का अपमान किया है.

और फिर सवाल करती है जिस कांग्रेस ने भगवा को आतंकवाद कहा, हिंदूत्व को गाली दी, क्या हम उन्हें माफ़ करेंगे?

कहा जा रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार के दौर में अभिनव भारत और दूसरे हिंदूत्व संगठनों से जुड़े बताये जानेवाले लोगों की मालेगांव, अजमेर, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस जैसे मामलों में हुई गिरफ़्तारियों ने वो हालात पैदा किए जिसमें साधवी प्रज्ञा को टिकट मिलने का रास्ता खुला.

इस सिलसिले में आरएसएस के सीनियर नेता इंद्रेश कुमार पर भी कई तरह के आरोप लगे थे.

आरएसएस दिग्विजय सिंह पर इन कथित साज़िशों को रचने और भगवा आतंकवाद और हिंदू आतंकवाद जैसे शब्दों को गढ़ने का आरोप लगाता रहा है.

दिग्विजय सिंह हालांकि कहते हैं कि उन्होंने इस शब्द का एक बार भी इस्तेमाल नहीं किया बल्कि इसका इस्तेमाल पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह जैसे लोगों ने किया जिनको बीजेपी ने टिकट दिया.

प्रज्ञा ठाकुर ने टिकट मिलने का ऐलान होने के दिन ही पार्टी जॉइन की थी.

शायद भारत के राजनीतिक इतिहास में ये पहली बार है कि चरमपंथ के आरोप में मुक़दमा झले रहे किसी व्यक्ति को चुनाव में खड़ा किया गया हो!

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