Friday, November 9, 2018

शत्रु संपत्ति के शेयर्स बेचेगी सरकार, बाजार में कीमत 3,000 करोड़

सरकार ने शत्रु संपत्ति के शेयर्स बेचने को लेकर बड़ा फैसला किया है। गुरुवार को सरकार ने शत्रु संपत्ति की बिक्री के लिए तय प्रक्रिया और कार्यप्रणाली को मंजूरी दे दी, जिसकी मौजूदा बाजार कीमत करीब 3,000 करोड़ रुपये है।

नई दिल्ली
सरकार ने शत्रु संपत्ति के शेयर्स बेचने को लेकर बड़ा फैसला किया है। गुरुवार को सरकार ने शत्रु संपत्ति की बिक्री के लिए तय प्रक्रिया और कार्यप्रणाली को मंजूरी दे दी, जिसकी मौजूदा बाजार कीमत करीब 3,000 करोड़ रुपये है। कस्टोडियन के पास पड़ी शत्रु संपत्ति के शेयर्स बेचने से सरकार को कमाई तो होगी ही, इसके साथ ही उसका विनिवेश लक्ष्य भी पूरा होगा। कैबिनेट की बैठक के बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पत्रकारों को फैसले की जानकारी दी।

आपको बता दें कि शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 के अनुसार शत्रु संपत्ति का मतलब उस संपत्ति से है, जिसका मालिकाना हक या प्रबंधन ऐसे लोगों के पास था, जो बंटवारे के समय भारत से चले गए थे। सरकार का यह फैसला काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब दशकों से बेकार पड़ी शत्रु संपत्ति को बेचा जा सकेगा।

शत्रु संपत्ति को लेकर सरकार ने हाल ही में एक कानून बनाया है। हालांकि मौजूदा प्रस्ताव शेयर्स को लेकर है और ऐसी बड़ी संपत्तियों में से एक का मालिकाना हक लखनऊ में राजा महमूदाबाद के पास था। उनके उत्तराधिकारियों ने इस कदम को आगे बढ़ाया।

20,323 शेयरधारकों के 996 कंपनियों में कुल 6,50,75,877 शेयर सीईपीआई (कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी ऑफ इंडिया) के कब्जे में है। इनमें से 588 ही फंक्शनल या ऐक्टिव कंपनियां हैं। एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि इन 996 कंपनियों में से 588 सक्रिय, 139 कंपनियां सूचीबद्ध हैं और शेष कंपनियां गैरसूचीबद्ध हैं। आपको बता दें कि मौजूदा कानून विपक्ष की आपत्ति के बाद संसद में लटक गया था और इसे अध्यादेश के तौर पर आगे बढ़ाया गया।

एक और टारगेट पूरा होगा
प्रसाद ने कहा, 'दशकों से निष्क्रिय पड़ी शत्रु चल संपत्ति को अब बेचा जा सकेगा। सेल से हुई आय का इस्तेमाल कल्याण कार्यक्रमों में होगा।' सरकार के इस कदम से केंद्र के विनिवेश प्रोग्राम को बढ़ावा मिलेगा, जो इस साल अब तक सुस्त रहा है जबकि इसका लक्ष्य 80,000 करोड़ रुपये है। इस वित्त वर्ष में 7 महीने पहले ही पूरे हो चुके हैं और सरकार अबतक 10,000 करोड़ रुपये ही जुटा सकी है। अब सरकार टारगेट को पूरा करने के लिए बायबैक पर ध्यान दे रही है, जो कुल वित्तीय घाटे के टारगेट को बरकरार रखने के लिए महत्वपूर्ण है

शत्रु संपत्ति के शेयर्स की बिक्री से मिले धन का इस्‍तेमाल विकास और समाज कल्‍याण के कार्यक्रमों में किया जा सकता है। सरकार की ओर से जारी बयान के अनुसार, इस प्रकार की संपत्ति की बिक्री से प्राप्त राशि उसी रूप से रखी जाएगी जैसा कि विनिवेश राशि के मामले में होता है। इसकी देखरेख वित्त मंत्रालय करता है। निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम या DIPAM) को शेयरों की बिक्री के लिए अधिकृत किया गया है। 

क्या है प्रक्रिया?
इन शेयरों को बेचने की प्रक्रिया के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग तथा गृहमंत्री को शामिल करके वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली वैकल्पिक कार्यप्रणाली (एएम) से मंजूरी प्राप्त करनी होती है। इस कार्यप्रणाली की सहायता अधिकारियों की एक उच्चस्तरीय समिति करेगी जिसके सह-अध्यक्ष दीपम विभाग के सचिव और गृह मंत्रालय के सचिव (आर्थिक मामलों के विभाग, डीएलए, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय और सीईपीआई के प्रतिनिधियों सहित) होंगे।

अफगान शांति वार्ता: पहली बार तालिबान के साथ मंच साझा करेगा भारत!

शुक्रवार को रूस में अफगानिस्तान मुद्दे पर होने वाली बैठक में भारत भी शामिल होगा। हालांकि भारत की ओर से यह साफ कर दिया गया है कि यह उसकी हिस्सेदारी 'गैर-अधिकारिक' स्तर पर होगी। सरकार ने इसके साथ ही भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि शांति के सभी प्रयासों का नेतृत्व और नियंत्रण अफगान लोगों के हाथ में होने चाहिए।

मॉस्को में होने वाली यह बैठक में भारत की उपस्थिति हालांकि गैर-आधिकारिक ही है लेकिन इससे भी कई लोगों को हैरानी हो सकती है। यह पहली बार होगा जब भारत तालिबान के साथ मंच साझा करेगा। भारत की ओर से इस बैठक में रिटायर्ड डिप्लोमैट टीसीए राघवन और अमर सिन्हा भाग लेंगे। 

आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि भारत के फैसले पर काफी विचार किया गया और इसमें अफगानिस्तान सरकार के 'कम्फर्ट लेवल' का खास ख्याल रखा गया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, 'हमें पता है कि रूसी प्रशासन 9 नवंबर को मॉस्को में एक बैठक की मेजबानी कर रहा है।' उन्होंने कहा, 'भारत ऐसे सभी प्रयासों का समर्थन करता है जिससे अफगानिस्तान में शांति और सुलह के साथ एकता, विविधता, सुरक्षा, स्थायित्व और खुशहाली आए। भारत की यह नीति रही है कि इस तरह के प्रयास अफगान-नेतृत्व, अफगान-मालिकाना हक और अफगान-नियंत्रित होनी चाहिए और इसमें अफगानिस्तान की सरकार की भागीदारी होनी चाहिए। हमारी हिस्सेदारी गैर-अधिकारी स्तर पर होगी।'

सूत्रों का कहना है कि विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव अमर सिन्हा, अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रहे हैं और टीसीए राघवन, पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त के तौर पर कार्यरत रहे हैं। ये दोनों ही इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।

समाचार एजेंसी स्पतनिक के अनुसार रूस ने 'मॉस्को फॉर्मेट' में अफगानिस्तान, भारत, ईरान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, चीन, पाकिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्केमिस्तान, उज्बेकिस्तान, अमेरिका और अफगान तालिबान को न्योता दिया है। 

पहले मॉस्को फॉर्मेट में भारत की ओर से संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी शामिल हुए थे लेकिन उसमें तालिबान नहीं था। मॉस्को की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति ने कहा गया, 'पहली बार दोहा स्थित तालिबान मूवमेंट के राजनीतिक दफ्तर से एक दल भाग ले रहा है।' हालांकि अफगान सरकार इसमें सीधे तौर पर भाग नहीं ले रही है लेकिन देश की हाई पीस काउंसिल इसमें भाग ले सकती है। रूसी उच्चायोग ने कहा है कि वह भारत और अन्य देशों का स्वागत करता है और शांति प्रक्रिया में भारत के प्रयासों का समर्थन करता है। 

Thursday, November 1, 2018

कांग्रेस-तेदेपा में होगा गठबंधन, राहुल ने कहा- पुरानी बातें भुलाकर साथ काम करेंगे

 राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि लोकतंत्र और देश को बचाने के लिए कांग्रेस और तेदेपा साथ मिलकर काम करेंगे। तेलुगु देशम पार्टी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने दिल्ली में नेशनल कॉन्फ्रेंस लीडर फारुख अब्दुल्ला, राकांपा चीफ शरद पवार और राहुल से मुलाकात की। उन्होंने कहा- हमारा लक्ष्य देश और संविधान को बचाना है। जब उनसे गठबंधन और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हम इस पर बैठकर बात करेंगे। नायडू विपक्ष दलों के नेताओं से मिलने के लिए गुरुवार को हफ्तेभर में दूसरी बार दिल्ली पहुंचे थे।

मुलाकात के बाद राहुल गांधी और चंद्रबाबू ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। राहुल ने कहा, ''हमें देश का भविष्य बचाना है। कांग्रेस और तेदेपा एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे। हमारी मुलाकात अच्छी रही। लोकतंत्र और संस्थाओं को बचाने के लिए सभी विपक्ष दलों को साथ आना चाहिए।''

नायडू ने कहा, ''कांग्रेस देश का मुख्य विपक्षी दल है। हमें दिल्ली में नहीं, बल्कि देश में रुचि है। देश की भलाई के लिए काम करना चाहते हैं। लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य देश और संविधान को बचाना है। कौन प्रधानमंत्री बनेगा, ये बाद की बात है। इसके लिए हम मिलकर बातचीत करेंगे।''

अखिलेश ने नायडू से फोन पर बात की थी

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार को नायडू से फोन पर बात की थी। उन्होंने तेदेपा प्रमुख से कहा कि वे भाजपा के खिलाफ मोर्चा तैयार करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं। शनिवार को नायडू ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव और बसपा प्रमुख मायावती से मुलाकात की थी। चंद्रबाबू मई में कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ समारोह में राहुल गांधी से मिले थे। इस समारोह में विपक्ष के कई दलों के नेता शामिल हुए थे।

भाजपा की राजनीति से लोकतंत्र को खतरा: नायडू

इसके बाद उन्होंने कहा था कि हम एक जैसी सोच रखने वाले दलों को एकजुट कर भाजपा का विकल्प तैयार करना चाहते हैं। भाजपा की राजनीति लोकतंत्र के लिए खतरा है। हमारा कर्तव्य है कि देश को इस खतरे से बचाया जाए। उन्होंने दावा किया था कि मुझे पहले दो बार प्रधानमंत्री पद का ऑफर मिल चुका है, लेकिन मैंने मना कर दिया। अब तेदेपा का राष्ट्रीय राजनीति में उतरने का वक्त आ गया है।

मार्च में एनडीए से अलग हुई थी तेदेपा
तेदेपा पहले केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए में शामिल थी, लेकिन आंध्र के लिए विशेष पैकेज की मांग को लेकर पार्टी ने मार्च में गठबंधन तोड़ने का फैसला कर लिया था। उन्होंने नाडयू ने मोदी सरकार पर आंध्रप्रदेश की जनता के साथ अन्याय और अपमान करने का आरोप लगाया था। कहा था कि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में किए वादे पूरे नहीं किए।